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दक्षिण भारत भाग दो

 गतांक से आगे..


तो अब बात मुद्दे की,

मुद्दा था ABRSM के राष्ट्रीय अधिवेशन में जंहा हमें तीन दिनों तक प्रतिभाग करना था, महासंघ द्वारा चुने गए स्थान पर एयरपोर्ट/रेलवे स्टेशन से पहुचाने की जिम्मेदारी जिन कर्मठी साथियों को दी गयी थी वो पूरी तन्मयता से रात के दो बजे भी हम लोगों के लिए एयरपोर्ट के बाहर मुस्तैद मिले। एकबारगी तो लगा शायद खुद से ही लोकेशन ट्रैक करके पहुचना होगा लेकिन ये क्या ! एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही ABRSM की टीम मौजूद थी। जल्दी ही हम लोगों को कैब द्वारा गन्तव्य तक रवाना किया गया, कैब में बैठने से पहले हम लोगों ने सोचा कि कैब तो 5 सीटर है तो एडजस्ट करके 5+1 (ड्राइवर) जरूरत पड़ने पर कर लेंगे, लेकिन हम यूपी में नही थे, वँहा हमारे सारथी ने बताया कि गाड़ी में केवल तीन पैसेंजर बैठेंगे, तो हम 7 लोगों के लिए तीन कैब की व्यवस्था ABRSM टीम द्वारा तुरन्त कर दी गयी। अब चूंकि वँहा से भी करीब एक डेढ़ घण्टे की दूरी पर चेननहल्ली नामक वो जगह थी जंहा हमें पहुचना था और कैब में रात के दो से तीन के बीच का समय, नींद और झपकी आनी तो लाज़मी थी, तो हम भी उसी में एक हल्की नींद मार लिए, और फिर आधी नींद में जगना पड़ा क्यों कि अपना स्टॉप जो आ गया था। फिर अपना बोरिया बिस्तर पीठ पर लादते हुए हम लोग अपने आवंटित होस्टल में पहुचे जंहा हमारे बिस्तर हम लोगों का बेसब्री से इन्तेजार कर रहे थे। सबसे पहले तो अपने जीवन के अभिन्न अंग को चार्ज करने की व्यवस्था बनाई गई जिसके माध्यम से हम और आप इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं उसके बाद खुद चार्ज होने की व्यवस्था हुई। बिस्तर पर पड़ते ही नींद हावी और आंख खुलती है सुबह के 7 बजे के आस पास। कंही से सूचना मिली कि चाय का समय खत्म हो चुका है, मुझे काटो तो खून नही वाली फीलिंग, एक तो बेड टी वाली आदत, लेकिन मैं भूल गया था कि हॉस्टल लाइफ में दुबारा आ चुका हूँ सो बेड टी की उम्मीद न करो। फ्रेश वगैरह हो के, नहा धो के अनमने मन से नाश्ते के लिए निकले तो जिंदगी में पहली बार नारियल के बाग के दर्शन हुए। जिस कैम्पस में हम लोगों का अधिवेशन था उसके अधिकांश भाग में नारियल का बागीचा ही था। फिर उन्ही बाग के बीच से गुजरते हुए हल्की बारिश की जरूरत महसूस हो रही थी और हाँ..हल्की हल्की से बारिश हुई भी, मन तो एकदम मस्त हो गया जो दिल की ख्वाइश पूरी हो गयी और अपना फेवरेट गाना गुनगुनाते हुए भोजन पंडाल की तरफ कदम बढ़ चले। वँहा पहुचते ही एक मुराद और पूरी हुई जैसे किसी ने चाय वाली अर्जी सुन ली हो...जी हां चाय वँहा मौजूद मिली तो दबा के पहले दो गिलास चाय पी गयी फिर नाश्ते का प्लान किया। वंही पे BTC 

2010 बैच के परम मित्र आशीष जी से भी मुलाकात हुई और पुरानी यादें ताजा हुईं।





































उसके बाद अधिवेशन का सत्र प्रारंभ हुआ। लंच के समय बाहर निकल के देखा कि वँहा के शिक्षक साथियों से अपनी कला का प्रदर्शन चित्रकारी के माध्यम से किया गया है जो देख के काफी अच्छा लगा।अधिवेशन तीन दिनों का था जिनमे कई चरण थे, जिसमे पूरे देश के शिक्षकों ने प्रतिभाग किया था। विभिन्न प्रांतों से पधारे, अलग अलग संस्कृति से लबरेज शिक्षक साथियों का इतना बड़ा समागम मेरे लिए पहला अनुभव ले के आया, जंहा एक साथ बैठकर खान-पान हुआ और एक दूसरे की संस्कृति को भी समझने का एक अवसर प्राप्त हुआ।वँहा की विशेष बात ये मिली कि इन तीन दिनों में दक्षिण भारतीय व्यंजनों का स्वाद मिला और स्वाद बिल्कुल ग़ज़ब का। नारियल की चटनी तो मेरी फेवरेट चीजों में से एक रही तो उसे खाने की क्या सीमा !! उन सभी व्यंजनों के नाम तो नही पता लेकिन फिर भी कुछ याद है जैसे पोंगल,रसम,तम्बली, मीठा गोज्जु,करी पत्ता युक्त छांछ और भी बहुत से व्यंजनों का स्वाद मिला जो कि शुद्ध शाकाहारी थे।अधिवेशन की समाप्ति पर हम लोगों को सहभागिता प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। उसके बाद हम लोगों की यात्रा अन्यत्र की ओर..


क्रमशः..

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